मुंबई का एक ऐसा शख्स, जिसने सट्टेबाजी का पूरा सिस्टम ही बदल दिया।
1960 के दशक में मुंबई बाजार से शुरू हुई किस्मत और दबदबे की अनोखी दास्तान।
शुरुआती दौर में 'न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज' के भाव पर सट्टा लगाया जाता था।
मिट्टी के मटके से निकलती थी किस्मत की पर्ची, जिससे इसका नाम 'मटका खेल' पड़ा।
खत्री का 'मुंबई मटका' धीरे-धीरे पूरे देश की धड़कन बन गया।
लाखों लोग रतन खत्री के नंबर पर आंख मूंदकर भरोसा करते और पैसा लगाते थे।
फिरोज खान की ब्लॉकबस्टर फिल्म 'धर्मात्मा' इसी मटका किंग की जिंदगी पर आधारित थी।
1975 में जेल जाने के बाद, खत्री के इस काले साम्राज्य की चमक फीकी पड़ने लगी।
कल्याणजी भगत जैसे नाम भी आए, पर रतन खत्री जैसा करिश्मा कोई दोबारा नहीं दिखा पाया।
10: 90 के दशक में खत्री ने सब छोड़-छाड़ कर एक साधारण और गुमनाम जिंदगी को चुना।
मई 2020 में उनके निधन के साथ ही मटका जगत के एक बड़े युग का अंत हो गया।
रतन खत्री का नाम आज भी सट्टा बाजार के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है।
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